Rafale Deal के लिए प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लगाकर कांग्रेस खुद के ही जाल में फंसी।

कहते हैं सिपहसालार अच्छा हो तो राजनीति आसान हों जाती है साथ ही इसका उल्टा भी उतना ही असरदार है कि सिपहसालार गफलत में रहनेवाला हो तो राजनीति में लूटिया डूबती भी है।

कांग्रेस और उसके युवराज के साथ कुछ ऐसा ही है। राफाल समझौते पर आधिआधुरी जानकारी के साथ विलंब के साथ चुनावी मौसम में आरोप लगाना उसे मुश्किल के डाल रहा है।

Rafael Deal को लेकर जो आरोप लगा है उसमें राफाल की कीमत को लेकर भ्रम फैलाने की कोशिश हुई है, मसलन के जब यूपीए सरकार में 500 करोड़ में कर रही थी तो एनडीए सरकार ने इसे 1500 करोड़ में कैसे तय किया। इसलिए ये घोटाला है।

एनडीए का कहना है कि मोदी सरकार और फ्रांस की सरकार के बीच किये गए समझौते में 36 राफाल लड़ाकू विमानों को कम्पलीट पैकेज के साथ लिया गया जबकि यूपीए सरकार 2013 में ये समझौता नही कर पाई थी क्योंकि 126 रफाल विमानों की कीमत पर बात अटकी और उस वक़्त के रक्षा मंत्री ने ये कहकर डील नही किया था कि इस पर फैसला अगली सरकार करेगी।

यानी जिस डील की बात कांग्रेस कर रही है वो उसने पक्का ही नही किया, जिसे मोदी सरकार ने सिरे से खारिज करते हुए नई डील की।

ये भी आरोप है कि प्रधानमंत्री मोदी ने बिना किसी की राय लिये ही समझौता कर लिया। जबकि सच्चाई ये है कि नई रक्षा विदेशी निवेश नीति के तहत प्रधानमंत्री को अधिकार है कि वो बिना कैबिनेट या मंत्री के ही विदशी निवेश पर देश हित मे समझौता कर सकते हैं।

अब बात अनिल अंबानी जिन पर आरोप है कि उनकी कम्पनी को भी इसमें ठेका मिला है और जब फ्रांस और भारत की सरकार के बीच समझौता हुआ तो उसे प्रभावित करने के लिए अनिल अंबानी भी पेरिस में मौजूद थे।

ये बात सही है कि अनिल अंबानी वहां मौजूद थे लेकिन वो प्रधानमंत्री मोदी के बिज़नेस प्रतिनिधि मंडल का हिस्सा थे। यही नही बल्कि वो पहले से ही भारत फ्रांस फोरम के सदस्य के तौर पर भी फ्रांस गए थे।

रही बात टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की बात नही होने की तो ये बात इस डील के कम्पलीट होने के क्लॉज़ में निहित है कि राफाल को बनानेवाली कम्पनी dassault इसकी तकनीक ट्रांसफर करेगी।

दरअसल गुजरात चुनाव में उलझी कांग्रेस प्रधानमंत्री मोदी पर हमला बोलने के लिए मुद्दे तलाश रही है और हड़बड़ाहट में बिना तथ्यों को खंगाले आरोप लगा रही है। बात ये है कि कांग्रेस फंसी कैसे? वो ऐसे के जब कांग्रेस इस डील के होने की बात 2015 की बता रही है जबकि डील सितंबर 2016 में प्रधानमंत्री मोदी के फ्रांस दौरे के समय हुई। यानी हर जगह कांग्रेस तथ्यों पर मार खा रही है।

यही वजह है कि वो सीधे सुप्रीम कोर्ट नही जाकर चुनावी मुद्दा बनाने में ज्यादा खुश है। और कोर्ट तो तथ्य और सबूत मांगेगा जो ना सुरजेवाला के पास है और ना ही राहुल युवराज गांधी के पास।

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